कुदरत की दोहरी मार से रोजी-रोटी को तरसी पिंडर घाटी!

मौसम की मार

  • आर्थिकी का मुख्य जरिया बनी कीड़ा-जड़ी का बुग्यालों में उत्पादन न के बराबर होने से लोग निराश
  • ऊंचाई पर बसे गांवों में अधिक बारिश के कारण खेतों में ही सड़-गल चुकी है गेहूं की फसल

थराली से हरेंद्र बिष्ट।

इस बार उच्च हिमालयी क्षेत्रों की तलहटी पर बसे गांवों पर कुदरत की दोहरी मार पड़ी है। एक ओर उच्च हिमालयी क्षेत्रों के आसपास बसे गांवों की आजीविका व आर्थिकी का मुख्य जरिया बन चुकी यारसांगबो (कीड़ा-जड़ी) का बुग्यालों में उत्पादन न के बराबर होने से इस बार आजीविका चलाने का संकट पैदा हो गया है। दूसरी ओर ऊंचाई पर बसे गांवों में अधिक बारिश के कारण गेहूं की फसल खेतों में ही सड़-गल चुकी है।  
बताया जा रहा है कि इस वर्ष अप्रैल अंतिम पखवाड़े तक बुग्याली क्षेत्रों में भारी बारिश व हिमपात होने के कारण कीड़ा जड़ी का उत्पादन काफी कम हो पाया था।जो कीड़ाजड़ी बुग्यालों में पैदा हुई भी, उसका ग्रामीण चुगान ही नहीं कर पाए। जानकारों का कहना हैं कि मई माह में भी उच्च हिमालयी क्षेत्र में चुगान के दौरान भी भारी बारिश होने के कारण कीड़ाजड़ी के चुगान के लिए बुग्यालों में गये लोगों को अन्य सालों की अपेक्षा न के बराबर ही जड़ी मिल पाई जिससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उधर अधिक वर्षा से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में गेहूं की फसल खेतों में ही सड़ जाने से ग्रामीणों के सामने जीवन यापन का नया संकट आ गया है।
दरअसल 6500 फुट से अधिक ऊंचाई पर बसे गांवों में आम तौर पर जून पहले पखवाड़े में गेहूं की फसल पक कर तैयार होती रही है। किंतु इस वर्ष जनवरी माह से ही अत्यधिक बारिश होने का विपरीत प्रभाव इस क्षेत्र के गेहूं की फसल पर पड़ा है। अधिक वर्षा के कारण फसल जून माह में पककर तैयार नहीं हो पाई।  

ऊंचाई पर बसे घेस की ग्राम प्रधान कलावती देवी, हिमनी की हीरा देवी, पूर्व क्षेपंस कलम सिंह पटाकी, क्षेपंस रेखा घेसवाल आदि ने बताया कि घेस, हिमानी, बलाण, पिनाऊं सहित तमाम अन्य ऊंचाई पर बसे गांवों में गेहूं की फसल अधिक बारिश के कारण खेतों में ही सड़-गल चुकी हैं। खेतों में उगा गेहूं इस कदर खराब हो चुका है कि इंसान तो दूर पालतू जानवर भी उसे नहीं खा रहे है। उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों में किसानों को 6 से 8 माह तक के खाने के लिए गेहूं मिल जाता था। किंतु विपरीत मौसम के चलते ग्रामीणों की यह आशा भी टूट चुकी हैं। इसके चलते ग्रामीणों के सम्मुख अब भूखों मरने की स्थिति पैदा हो गई है।
सवाड़ वार्ड की जिला पंचायत सदस्य आशा धपोला ने बताया कि उक्त गांवों के अलावा पिंडर क्षेत्र के ऊंचाई पर बसे गांवों में भी गेहूं की फसल के यही हाल है। उन्होंने शासन-प्रशासन से इन क्षेत्रों में विपरीत मौसम के चलते खराब हो चुकी फसलों का आंकलन कर ग्रामीणों को आवश्यक राहत दिए जाने की मांग की है।
इस संबंध में कृषि एवं भूमि संरक्षण अधिकारी थराली आनंद सिंह गोस्वामी ने बताया कि इस वर्ष उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी एवं अधिक बारिश का फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। जब उन्होंने मई माह के आखिरी सप्ताह में घेस घाटी का दौरा किया था तो गेहूं की फसल काफी अधिक हरी थी उसके बाद हुई लगातार बारिश होने एवं धूप न आने से फसल नहीं पक पाई और खराब हो गई। बताया कि अगर किसानों ने फसल बीमा कराया होता तो उन्हें नुकसान की क्षतिपूर्ति की जाती किंतु अधिकांश किसानों ने बीमा ही नहीं करवाया हैं। जिससे विभाग किसानों की सहायता नहीं कर पा रहा है।

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