देहरादून। उत्तराखंड में कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर कम उम्र के नेता को नया मुख्यमंत्री बनाने का हाईकमान का फैसला कहीं भाजपा में बगावत का कारण तो नहीं बनने जा रहा है? ऐसे सवाल उत्तराखंड कि हवा में तैरने लगे हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के कई विधायक नाराज हैं।
तीरथ सरकार में रहे पूर्व मंत्री बिशन सिंह चुफाल ने तो बकायदा प्रदेश अध्यक्ष को फोन कर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। साथ ही स्पष्ट किया कि वह मंत्री के तौर पर शपथ नहीं लेंगे। इस बात की भनक लगते ही नैनीताल के सांसद अजय भट्ट मनाने चुफाल के आवास पहुंच गए। उन्होंने उनको समझाकर मना लिया। लेकिन कई और दिग्गज भी नाराज चल रहे हैं।
इस बगावत से केन्द्रीय कमान के चुने हुए सीएम पुष्कर सिंह धामी की राह आसान होने के बजाय मुश्किल होती जा रही है। अब माना जा रहा है कि दो डिप्टी सीएम बनाकर कुछ विरोध को दबाने का प्रयास हो सकता है। इनमें एक के लिए सुबोध उनियाल का नाम बताया जा रहा है। वह तीरथ मंत्रिमंडल में शासकीय प्रवक्ता रहे हैं। दूसरे डिप्टी सीएम के लिए एक नेता के बेटे का नाम तय हो सकता है।
धामी के नाम की बतौर मुख्यमंत्री घोषणा के बाद सीएम का सपना संजोए भाजपा के मंत्री और विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। जिन विधायकों का नाम संभावित सीएम के लिए उछल रहा था, उनमें तीरथ सरकार के मंत्री बिशन सिंह चुफाल भी थे। चुफाल को त्रिवेंद्र ने भी कैबिनेट में शामिल नहीं किया था। वह तीरथ सरकार में मंत्री बने। पहले वह खंडूड़ी कैबिनेट में भी मंत्री रहे।
अब यह भी माना जा रहा है कि पूर्व कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत भी मंत्रिमंडल में शामिल होने से किनारा कर सकते हैं। ये दोनों ही नेता सीएम के दावेदार थे। भाजपा के कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत, यशपाल आर्य भी नाराज बताए जा रहे हैं। यशपाल आर्य को मनाने डॉ. धन सिंह समेत तीन पूर्व मंत्री उनके आवास पर पहुंच गए हैं। यहां लड़ाई अब अनुभव और अनुभवहीनता के बीच शुरू हो गई है। कारण यह है कि दो बार विधायक रहे धामी एक बार भी मंत्री नहीं बने थे। अब तक जो पार्टी उनको मंत्री लायक नहीं समझ रही थी, रातोंरात उसी पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया कैसे?
इसको लेकर हैरानी जताई जा रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि नाराज विधायकों में कुछ पिछली तीरथ व त्रिवेंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान कांग्रेस पृष्ठभूमि के भाजपा में आए कुछ कददावर नेताओं के साथ ही भाजपा पृष्ठभूमि के मंत्री रह चुके कुछ वरिष्ठ विधायक भी इनमें शामिल हैं।
गौरतलब है कि नेता चयन से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछली सरकारों में मंत्री रहे दो नेताओं को फोन भी किए। त्रिवेंद्र और तीरथ सरकारों में कैबिनेट मंत्री रहे सतपाल महाराज व डॉ. हरक सिंह रावत के नाम भी चर्चा में थे। विधायक दल की बैठक खत्म होने के तुरंत बाद ये प्रदेश भाजपा कार्यालय से चले गए। इसे नेता चयन के मामले में नाराजगी से जोड़कर देखा गया।
खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत उत्तराखंड की राजनीति में कद्दावर माने जाते हैं। दोनों ही उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के पहले से राजनीति में हैं। सतपाल महाराज केंद्र में राज्य मंत्री रह चुके हैं, जबकि हरक सिंह रावत अविभाजित उत्तर प्रदेश में भी कैबिनेट मंत्री रहे हैं। वर्ष 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनने पर इन्हें खासे वजनदार मंत्रालय दिए गए थे। चर्चा है कि अलग की गई बैठक मे कई विधायक भाजपा नेतृत्व के स्तर से स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ अन्य विधायकों को भी धामी के नेता चुने जाने का फैसला रास नहीं आया है।

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