सड़े हुए सिस्टम की बदौलत ‘राज’ कर रहा भ्रष्ट पुलिस, बाहुबली नेता और अपराधी का गठजोड़!

देश का सबसे खतरनाक त्रिकोण

  • राजनीति-पुलिस-अपराध गठजोड़ की उपज होते हैं विकास दुबे जैसे शातिर अपराधी
  • तभी तो थाने में बैठे भाजपा नेता राज्यमंत्री की हत्या के बावजूद पुलिस गवाही से मुकरी
  • करीब 20 सालों में विकास की गुंडई को बढ़ावा देने वाली पुलिस को भारी पड़ी ‘दोस्ती’  

कानपुर। करीब 19 साल पहले विकास दुबे के खिलाफ मुकदमा लिखाया गया। आरोप था कि उसने तत्कालीन भाजपा नेता और राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की थाने में घुसकर हत्या कर दी थी। इसके बावजूद पुलिस गवाही से मुकर गई और तफ्तीश कमजोर रही। लिहाजा दुबे छूट गया। इसके बाद वह कई बाहुबली नेताओं की सरपरस्ती में पूरी गुंडई के साथ अपना आतंक बढ़ाता रहा और अब बीती रात उसने 8 पुलिस वालों की हत्या कर दी। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे बदमाशों के सरपस्त कई बाहुबली नेता आज भी विधानसभाओं और संसद में बैठकर समाज सुधार पर प्रवचन देते हैं ओर खूब तालियां बजती है। यह एक नमूना है हमारे सड़े हुए सिस्टम का। इसके साथ ही कानपुर एनकाउंटर की
यह घटना भी आईना है बरसों से चले आ रहे पुलिस, नेता और अपराधियों के गठजोड़ का।
एक रिटायर्ड आईपीएस का इस बाबत कहना है कि 25 हजार का इनामी बदमाश सीओ समेत आठ पुलिस वालों को मार डाले, यह बात ताज्जुब में डालने वाली है। यूपी में पुलिस, सियासत और अपराध का गठजोड़ ही ऐसा रहा है। हालांकि यहां हार्डकोर अपराधियों के लिए पुलिस वाले की हत्या करना दरबार में आए दूत को मारने जैसा अनैतिक अपराध माना जाता है। बड़े से बड़े माफिया, सुसंगठित गिरोह और बाहुबली भरसक कोशिश करते हैं कि कोई पुलिस वाला उनके हाथों न मारा जाए। अलबत्ता पुलिस वालों की बढ़िया पोस्टिंग में अपराधियों से बाहुबली नेता बने ये जरायमपेशा लोग मददगार जरूर होते रहे हैं।
कानपुर में विकास दुबे के हाथों हुए इस कांड ने पुलिस महकमे को हिलाकर रख दिया है। ऐसी दो घटनाएं ही याद आती हैं। एक तो उनमें नक्सली हमला था। चंदौली जिले में 20 नवंबर 2004 को डेढ़ सौ से अधिक नक्सलियों ने घात लगाकर 17 कॉन्स्टेबलों को मार दिया था। इसके अलावा 1981 में एटा जिले के अलीगढ़ थाने में डाकू छविराम के गिरोह ने 9 पुलिस वालों को घेर कर मार डाला था। अपने मुखबिरों और पुलिस में बैठे भेदियों के जरिए छविराम ने गिरोह का पीछा कर रहे इंस्पेक्टर राजपाल सिंह को थका-थकाकर निढाल कर दिया। उसने अपने गिरोह को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर पहले तो पुलिस को चकमा दिया। फिर घेर कर इंस्पेक्टर समेत नौ लोगों को मार डाला।
इसी दौरान बेहमई कांड हुआ। इसके बाद एक दर्जन से अधिक मल्लाहों और फिर यादवों को मारे जाने के दो बड़े कांड हुए थे। इन्हीं घटनाओं के मद्देनजर तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि उससे पहले बाबा मुस्तकीम और छविराम गिरोह को पुलिस ने एनकाउंटर करके खत्म कर दिया था। शायद यह वही दौर था जब नेता, पुलिस और अपराधियों ने अपने दायरों को समझ लिया।
यूपी में पूरब से लेकर पश्चिम तक के बड़े से बड़े अपराधी गिरोह ने पुलिस से सीधा मोर्चा कभी नहीं लिया। राजनीति के अपराधीकरण का केंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश का गोरखपुर रहा है। अस्सी-नब्बे के दशक में हरिशंकर तिवारी गिरोह का दबदबा था। तिवारी खुद विधायक बने। बाद में उनके गिरोह के रजिस्टर्ड मेंबर रहे साथी भी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। फिलहाल मधुमिता हत्याकांड के दोषी अमरमणि त्रिपाठी भी इनमें से एक थे। इनमें से किसी ने भी पुलिस से सीधी मुठभेड़ नहीं की। उनकी प्रतिद्वंद्विता वीरेंद्र शाही गिरोह से थी। इनकी आपसी मुठभेड़ों में काफी लोग मारे गए।
गोरखपुर जिले का रहने वाला गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला महज 25 साल में पुलिस के लिए आफत का सबब बन गया था। श्रीप्रकाश हजरतगंज के एक मशहूर हेयर ड्रेसर के यहां दाढ़ी बनवाने आया था। पुलिस को खबर लग गई। घेराबंदी हुई तो फायरिंग करता हुआ श्रीप्रकाश दारुलशफा विधायक निवास की ओर भाग निकला। दरोगा आरके सिंह ने उसका पीछा किया। पीछा करते हुए आरके सिंह को ठोकर लगी और वह गिर पड़े। उनकी रिवॉल्वर छिटककर गिर गई। भाग रहा श्रीप्रकाश अचानक पलट पड़ा और रिवॉल्वर उठाकर सब इंस्पेक्टर आरके सिंह को उसी की रिवॉल्वर से गोली मार दी।
हालांकि इस मुठभेड़ में शामिल रहे सीनियर अफसरों ने उसे बाद में मुठभेड़ में मार गिराया। वाराणसी के ब्रजेश सिंह, त्रिभुवन सिंह, मुख्तार अंसारी और इलाहाबाद के अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों ने पुलिस पर सीधा अटैक नहीं किया। प्रदेश के ज्यादा अपराधियों और बाहुबली विधायकों का यही दस्तूर रहा। पुलिस वाले, आईएएस और नेता भी बाहुबलियों के साथ अपने संबंधों को निर्वाह समय समय पर खूब करते रहे।
थाने में मारे गए संतोष शुक्ला के भाई मनोज शुक्ला कहते हैं कि उनके भाई की हत्या में पुलिस की कमजोर चार्जशीट और पुलिस वालों के बयानों से मुकरने के कारण विकास दुबे बच निकला था। वर्ष 2005 में वह शुक्ला हत्याकांड से बरी हो गया। तत्कालीन सरकार हाई कोर्ट भी नहीं गई क्योंकि तब उसे बसपा का संरक्षण था। स्थानीय लोग बताते हैं कि वह एक प्रिंसिपल की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा के कारण जेल में था। आम चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल के एक नेता ने उसे जेल से बाहर निकलवाने में मदद की। वही मदद अब आठ पुलिस वालों की हत्या का कारण बनी।
राजनीति में पुलिस और अपराधियों के इस्तेमाल के कारण जो हालात बन रहे हैं, वे बेहद खतरनाक हैं। एक पार्टी की सत्ता रहने पर जो लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, वह सत्ता बदलने पर अचानक जोखिम में आ जाते हैं। 1861 में बने पुलिस कानूनों में आज की जरूरतों के हिसाब से बदलाव बेहद जरूरी है। 

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