देहरादून के खलंगा के जंगलों पर भू-माफिया का कब्जा, जांच की तो सामने आया कुछ और ही सच

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का खलंगा वन क्षेत्र एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। नालापानी क्षेत्र के इस जंगल पर भूमाफियाओं की गिद्ध दृष्टि टिकी हुई है, जो यहां पर कैंपिंग और रिजॉर्ट बनाने की तैयारी में लगे हुए हैं। जिसके लिए इस संरक्षित वन भूमि के 40 बीघा क्षेत्र में तारबाड़ और गेट लगाया जा रहा है।
इस बारे में सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ तो स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू कर दिया है। बड़ी संख्या में ग्रामीण जंगल बचाने के लिए आगे आए हैं और जंगल बचाओ आंदोलन की तर्ज पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। महिला पत्रकार ने जब वहां काम करा रहे हरियाणा निवासी से अनिल शर्मा से इस संबंध में पूछा तो उसने बताया कि यह वन भूमि उन्होंने ऋषिकेश निवासी अशोक अग्रवाल से लीज पर ली है। हालांकि, इस घने जंगल में बिना साल के पेड़ों को नुकसान पहुंचाए, कैंप कैसे बनेगा? इसका ब्लूप्रिंट भी उनके पास नहीं है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह जमीन इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) को लीज पर दी जा रही है, जिसके तहत रिज़र्व फॉरेस्ट एरिया में तारबाड़ की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जंगल को काटा गया या सीमित किया गया तो इससे पर्यावरण को नुकसान होगा। वन कार्मिकों ने संबंधित दस्तावेज जांचे और आसपास की वन भूमि पर कब्जा या पेड़ कटान न करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही यहां वन कर्मियों की ओर से नियमित निगरानी की जाएगी।
खलंगा चलो का नारा
वहीं सोशल मीडिया में एक बार फिर से ‘खलंगा चलो’ का नारा बुलंद हो गया है। सैंकड़ों पर्यावरण प्रेमी और समाज सेवियों ने रविवार को खलंगा पहुंचने की अपील लोगों से की है। संरक्षित वन क्षेत्र में हो रही तारबाड़ और गेट लगाने का वीडियो भी वायरल होने के बाद आज भी कई लोग खलंगा पहुंच गये हैं। हालांकि, कुछ लोगों ने रात के समय जा कर वन क्षेत्र में लगाये गये गेट को तोड़ दिया गया। वहीं, कुछ समाजसेवियों ने तारबाड़ के लिए लगाए गए एंगल उखाड़ कर फेंक दिए हैं।
एक साल पहले गरमाया मामला
एक साल पहले इसी वन क्षेत्र में करीब 2 हजार पेड़ काटे जाने का युवाओं, पर्यावरण प्रेमियों ने जबरदस्त विरोध किया था। खलंगा में वॉटर ट्रीटमेंट पर रिजर्व वायर के लिए योजना बनायी जानी थी जिसके लिए दो हजार पेड़ों को काटा जाना था। इसके लिए लगभग छह हेक्टेयर क्षेत्र के पेड़ों पर नंबरिंग भी की गई थी। लोगों को जब इसकी जानकारी मिली तो इसका विरोध शुरू हो गया।








