सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की दी मंजूरी, 13 साल से कोमा जैसी हालत में है युवक

नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय पहलू से जुड़े इच्छामृत्यु के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए आदेश पारित किया। यह आदेश कोर्ट के 2018 के Common Cause फैसले के अनुसार दिया गया, जिसमें गरिमा के साथ मरने के मौलिक अधिकार को मान्यता दी गई थी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि यह 2018 के कॉमन कॉज रूलिंग का पहला न्यायिक कार्यान्वयन है, जिसमें सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी गई है। 15 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने 32 साल के हरीश राणा के परिवार की उस अर्जी पर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसमें लगभग 13 साल से वानस्पतिक अवस्था (Vegetative State) में रहने वाले उसके लाइफ-सपोर्ट को हटाने की मांग की गई थी। वानस्पतिक अवस्था में व्यक्ति जागा हुआ दिखता है। जबकि कोमा में चेतना और जागृति दोनों ही नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और राणा के परिवार की ओर से पेश वकील रश्मि नंदकुमार की दलीलें सुनीं। 13 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट के जजों ने राणा के माता-पिता और उसके छोटे भाई से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात की थी। परिवार ने जजों को बताया था कि वे नहीं चाहते कि उसे और तकलीफ हो।
2013 में, हरीश अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे और उनके सिर में चोट लग गई थी, जो पंजाब यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे। तब से, वह पूरी तरह से बिस्तर पर हैं, और एक आर्टिफिशियल सपोर्ट सिस्टम पर हैं। इतने वर्षों में यह दूसरी बार है जब उसके माता-पिता ने हरीश के लिए पैसिव यूथेनेशिया की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पिछले साल नवंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर ध्यान दिया था जिसमें कहा गया था कि हरीश को होम केयर में रखा जाएगा, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार मदद करेगी और डॉक्टर और एक फिजियोथेरेपिस्ट रेगुलर विजिट करेंगे।








