श्री नंदा देवी लोक राजजात यात्रा पर भी छाया कोरोना का संकट!

  • अब तक यात्रा समिति एवं प्रशासन ने भी इस यात्रा के संबंध में जारी नहीं किये स्पष्ट दिशा-निर्देश

थराली से हरेंद्र बिष्ट।

सदियों से आयोजित होने वाले श्री नंदा देवी लोक राजजात यात्रा पर भी कोरोना का संकट छाने लगा हैं। आयोजन होगा या नहीं, किस तिथि को देवी की डोलियां सिद्धपीठ के गर्भगृर्भ कुरूड़ से बाहर निकलेगी, यात्रा होगी तो कितने यात्री यात्रा के साथ रहेंगे, आदि प्रश्न उठने लगे हैं। अब तक यात्रा समिति एवं प्रशासन ने भी इस यात्रा के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी न करने से यात्रा को लेकर संशय के बादल गहराते जा रहें हैं।

गौरतलब है कि सदियों से उत्तराखंड में प्रत्येक 12 वर्षों में श्री नंदा देवी की विश्व की सबसे लंबी एवं कठिन राजजात यात्रा का आयोजन होता रहा है। जिसमें पूरे उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से नौ देव डोलियों के साथ ही सम्मिलित होते हैं। यात्रा नौटी (कर्णप्रयाग) से शुरू हो कर त्रिशुली एवं नंदाघुघटी हिम पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी पर स्थित हेमकुंड तक जाती हैं। 12 वर्षों में आयोजित होने वाली राजजात यात्रा के अलावा इसी यात्रा से जुड़ी श्री नंदा लोकजात यात्राओं का प्रत्येक साल भादों मास में सदियों से आयोजन होता आ रहा हैं। जो नंदा सिद्ध पीठ कुरूड़ (घाट) से शुरू होती है।
इसके तहत बधाण की नंदा देवी की यात्रा कुरूड़ से शुरू हो कर बेदनी बुग्याल तक जाती हैं। जिसका समापन सिद्धपीठ देवराड़ा (थराली) में नंदा देवी के ऐतिहासिक उत्सव डोली के गर्भगृह में छह माह के प्रवास पर विराजमान होने के बाद समापन होता हैं। जबकि कुरूड़ सिद्ध पीठ से ही शुरू होने वाली दशोली की दशमद्वार की नंदा देवी की लोक जात यात्रा क्षेत्र के विभिन्न गांवों से होते हुए बालपाटा तक जाती हैं। जहां पर पूजा के बाद यात्रा के वापस लौटने के बाद समापन हो जाता है। इस बार कोरोना महामारी के चलते इन्हें यात्राओं को लेकर संसय के बादल मंडराने लगे हैं। किसी की समझ में नही आ रहा हैं कि यात्रा होगी कि नहीं?

एक साथ दो-दो देव यात्रा के संबंध में नंदा देवी राजराजेश्वर मंदिर समिति कुरूड़ के अध्यक्ष मंशाराम गौड़ और उपाध्यक्ष राजेश गौड़ का कहना हैं कि अभी समिति ने तय नहीं किया हैं कि किस तिथि को नंदा की उत्सव डोलियों को कुरुड़ सिद्ध पीठ के गर्भगृह से बाहर निकाला जाएगा। इस संबंध में उन्होंने जिला प्रशासन से भी दिशा-निर्देश मांगे गए हैं। उसके बाद ही आगे की रणनीति तैय की जाएगी। इस बारे में पड़ावों के अध्यक्षों, ग्राम प्रधानों, 14 सयानों से भी रायमांगी गई है। इसी के बाद आगे की रणनीति तैय की जाएगी।
परंपरा के अनुसार जन्माष्टमी के पर्व पर कुरुड़ सिद्ध पीठ के गर्भगृह से डोलियों को बाहर निकाल कर यात्रा शुरू करने की रही है। बधाण की देव डोली को अमावास्या के दिन हर हाल में थराली के सूना गांव पहुंचने की हैं। अब जबकि 11 अगस्त को जन्माष्टमी का पर्व काफी करीब हैं। किंतु यात्रा के संबंध में किसी भी तरह की तैयारी शुरू न होने के कारण सब कुछ भविष्य के गर्त में है।

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