‘सर! आप सुबह तोलोलिंग टाॅप पर आना, वही मिलेंगे’

कारगिल के शहीदों और वीरों को सलाम

  • सेकंड राजपूताना राइफल्स के 80 सूरमाओं ने जान देकर निभाया अपने सीओ से किया वादा   
  • कारगिल युद्ध के अमर शहीदों और उसके नायक को भावभीनी श्रद्धांजलि 

कारगिल की सबसे पेचीदा, मुश्किल और खूनी जंग तोलोलिंग पहाड़ी पर लड़ी गई थी। वह भी बिना किसी तोपखाने की मदद के बगैर। जिसमें 18 ग्रिनेडियर और 16 ग्रिनेडियर बटालियनों ने बेहिसाब नुकसान झेला था। तोलोलिंग पहाड़ी पर जंग जारी थी। तोलोलिंग की वो पथरीली पहाड़ी पूरे युद्ध के दौरान हुई शहादतों में से लगभग आधी शहादतों के लिए जिम्मेदार थी।
करीब महीने भर के संघर्ष और खून बहाने के बाद भी तोलोलिंग पहाड़ी भारत की पहुँच से दूर थी। तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक के लिए ये एक चुनौती थी, क्योंकि भारतीय आक्रमण की धार यहाँ आकर कुंद पड़ जाती थी। ग्रिनेडियर्स के लगातार धावे केवल उनकी शहादतों की फिगर बढ़ा रहे थे। मजबूरन एक नई और ताजा दम बटालियन को ये टास्क सौंपा गया था।
कुपवाड़ा से एक नई बटालियन सेकंड राजपूताना राइफल्स को 24 घंटे के अंदर गुमरी में रिपोर्ट करने को कहा गया। केवल एक दिन के मौसम और टैरेन के अनुसार ढलने की एक मिलिट्री टर्म के बाद ही बटालियन को लाँच करने की योजना उनके कमांडिंग आफिसर कर्नल एमबी रविंद्रनाथ ने की थी। कर्नल रविंद्रनाथ ने बटालियन के चुनिंदा 80 एथलीटों और अफसरों की चार टीमें बनाकर उन्हें युद्ध के लिए तैयार किया। देखा जाए तो वास्तव में ये एक आत्मघाती मिशन था। रात को आठ बजे आखिरी जंग पर जाने से पहले पेपटॉक में कर्नल रवींद्रनाथ ने अपने 80 सूरमाओं से कहा, ‘मैं तुम्हारा सीओ हूँ और तुम्हीं मेरा परिवार हो। तुमने बटालियन के लिए खेल के मैदानों में मेडल ही मेडल जीते हैं। तुमने जो भी माँगा मैंने दिया। क्या मैं तुमसे अपने लिए एक चीज माँग सकता हूँ? जवानों के आग्रह करने पर रवींद्रनाथ ने लगभग चीखकर कहा— तो मेरे बच्चों! आज मुझे तोलोलिंग दे दो। रविन्द्रनाथ ने उन सूरमाओं को इतना ज्यादा भावुक कर दिया कि सूबेदार भंवर लाल भाखर पेपटाॅक के बीच में ही बोल पड़ा,’ सर! आप सुबह तोलोलिंग टाॅप पर आना, वहीं मिलेंगे।’

फिर जो कुछ हुआ वो भारत के युद्ध इतिहास का सुनहरा पन्ना है। घमासान और खूनी संघर्ष के बाद बटालियन सेकंड राजपूताना राइफल्स ने ऊँची चोटी पर बैठे 70 से ज्यादा पाकिस्तानियों के हलक में हाथ डालकर “विजयश्री” हासिल तो की मगर बहुत बड़ी कीमत चुकाकर। चार अफसर, पांच जेसीओ और 47 जवानों को तोलोलिंग की पथरीली ढलानों ने लील लिया था और लगभग आधे इतने ही गंभीर रूप से जख्मी थे। बलिदान की इस निर्णायक घड़ी में महानायक बनकर उभरे थे कर्नल रवींद्रनाथ। जिन्होंने अपनी बटालियन को ऐसे मोड़ पर कमांड और लीड किया, बड़ी कीमत चुकाकर देश को वो यादगार पल दिया, जिसे कारगिल युद्ध् का निर्णायक मोड़ कहा जाता है। केवल इसी लड़ाई ने कारगिल युद्ध का पासा भारत के पक्ष में पलट दिया था मगर बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी। मेजर आचार्य, मेजर विवेक गुप्ता, कैप्टन नेमो, कैप्टन विजयंत थापर, सूबेदार भँवरलाल भाखर, सूबेदार सुमेर सिंह, सूबेदार जसवंत, हवलदार यशवीर तोमर, लांस नायक बचन सिंह उनमें से थे जो विजय के दिन की सुबह का सूरज नहीं देख पाये।
नायक दिगेन्द्र कुमार वार_ट्राॅफी के तौर पर पाकिस्तानी सेना के मेजर अनवर खान का सिर काटकर रख लिया। मेजर विवेक गुप्ता और नायक दिगेन्द्र कुमार महावीर चक्र से नवाजे गये। जबकि कर्नल रवींद्र, हवलदार यशवीर, सूबेदार सुमेर सिंह को वीर चक्र से नवाजा गया। युद्ध की सफलता का सेहरा कर्नल रवींद्रनाथ के सिर बंधा जिसके वो हकदार भी थे। लड़ाई के बाद कर्नल रिटायर हो गये, मगर तोलोलिंग की चोटियों पर शहीद हुए जवानों के परिजनों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। प्रत्येक शहीद के बच्चों और विधवाओं से वो नियमित संपर्क में थे। उनके बच्चो की स्कूलिंग, विधवाओ की पेंशन, बुजुर्गों की चिकित्सा के सारे मामले उन्होंने खुद संभाले। मिलिट्री स्कूल छैल, धौलपुर और अजमेर में उन्होंने शहीदों के बच्चों की बेहतर पढ़ाई और व्यक्तित्व निर्माण का जिम्मा उठाया।
तोलोलिंग पर शहीद हुए गनर लांस नायक बचन सिंह के पुत्र हितेश कुमार ने हाल ही में जब इंडियन मिलिट्री एकेडेमी देहरादून से अपने पिता की बटालियन में अफसर के तौर पर कमीशन लिया तो उनकी माता कामेश बाला ने मुक्त कंठ से बेटे के कमीशन का श्रेय कर्नल साहब को दिया। उन्होंने शहीद हुए सैनिकों के बच्चों को कभी अकेला नहीं छोड़ा। नियमित रूप से उनकी समस्याऐं सुनकर समाधान के लिए सदैव प्रस्तुत रहे।
सैनिक स्कूल बीजापुर के इस पूर्व छात्र और स्टैलवार्ट आफिसर के नाम से प्रसिद्ध कर्नल रवींद्रनाथ ने आठ अप्रैल 2018 को दुनिया को अलविदा कह दिया। देश के बेहद योग्य कमांडरों के तौर पर प्रसिद्ध इस युद्धनायक ने अंतिम समय तक अपनी बटालियन रूपी परिवार के प्रति फर्ज निभाये और अपनी बटालियन के शहीदों से मिलने के लिये स्वर्ग सिधार गये। वो  बात अलग है कि मीडिया में उनके जाने की खबर को तवज्जो नहीं मिली, लेकिन उन जैसे बहादुर वीरों का कद मीडिया के पन्नों से कहीं ज्यादा बड़ा होता है।

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