• 68 साल के सोबत सिंह बागडी नें 10 साल अकेले दिन रात कार्य करके बंजर पहाड़ में उगा दिया आम का बागान

रूद्रप्रयाग: आज बात पहाड़ की और एक पहाडी के पुरुषार्थ की जिन्होंने अपनी जिद और हौंसलों से सफलता की नयी परिभाषा गढ़ी है और रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीदों को पंख लगायें हैं…

मेरे सपनों की उड़ान आसमान तक है
मुझे बनानी अपनी पहचान आसमान तक है
मैं कैसे हार जाऊं और थक कर बैठा रहूं
ये जुनून ये अरमान आसमान तक है।
मुझे बनानी अपनी पहचान आसमान तक है…

उक्त पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया है रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली ब्लाॅक के सेमलता गांव (भरदार) के 68 वर्षीय सोबत सिंह बागडी जी नें। जिन्होंने विगत 10 साल में बंजर और पथरीली जमीन पर आम का बागान तैयार करके लोगों को अचंभित कर दिया है। उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीदों को पंख लगायें हैं और उम्र के इस पड़ाव पर पहाड़ में स्वरोजगार माॅडल को धरातल पर उतार कर लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है कि कैसे वीरान, बंजर और पथरीली जमीन पर भी हौंसलों की फसल लहलाई जाती है।

माटी का प्यार खींच लाया वापस गांव, 10 सालों से अकेले ही शिद्दत से जुटें है काम में..

दिल्ली में बैंक की नौकरी और ऐशोआराम की जिंदगी जीने के बाद भी सोबत सिंह बागडी का मन कभी भी शहर की चकाचौंध भरी दुनिया में नहीं लगा। 10 साल पहले उन्होंने अपने बेटे, पत्नी और बेटी के सामने गांव लौटने की बात कही। उनकी बात सुनकर सबने कहा की इस उम्र में आखिर पहाड़ पर करेंगे क्या–?? उन्होंने गांव लौटने के लिए साफ मना कर दिया था। दो साल इसी उधेडबुन में बीत गये की अपने गांव को छोडे सालों हो गयें हैं अब तो सबकुछ नये सिरे से शुरू करना होगा। आखिरकार 2012 में सोबत सिंह बागडी नें महानगरों की ऐशोआराम की जिंदगी को छोड अपनें गांव लौटने का फैसला किया। गांव आकर सबसे पहले अपने पुश्तैनी मकान को नये सिरे से निर्माण किया और फिर जुट गए अपने मिशन में..

आम के बागन के जरिए दिखलाई स्वरोजगार की राह, आज बनें हैं प्रेरणास्रोत..

2012 में सोबत सिंह बागडी जब दिल्ली से वापस घर लौटे तो आस पास के गाँव वालो और रिश्तेदारों नें उनके इस फैसले को गलत करार दिया और कहा की उम्र के इस पड़ाव पर पहाड़ में क्या करेंगे। कई लोगों नें उन्हें हतोत्साहित भी किया लेकिन जिद और अपनी धुन के पक्के सोबत सिंह बागडी नें कुछ अलग करने की ठानी। शुरूआत में उन्होंने इमारती लकड़ी के पेड लगानें की सोची लेकिन उन्हें कुछ समय बाद लगा ये सही चुनाव नहीं है। आखिरकार उन्होंने गांव की जलवायु और पथरीली, बंजर भूमि को आम के बागान के लिए उपयुक्त माना। जिसके बाद उन्होंने आम का बागान तैयार करने की ठानी। जिसके लिए उन्होंने रूद्रप्रयाग से लेकर श्रीनगर, देहरादून का भ्रमण कर आम के पेड और इसके बागान को लेकर जानकारियां एकत्रित की। उद्यान विभाग से आम के विभिन्न प्रजातियों के 400 पेड और स्वयं के खरीदे 800 आम सहित कुल 1200 आम के पेड, 300 नींबू और 1000 से अधिक कटहल के पेड लगायें। 2012 से वे लगातार इन पेड़ो की देखरेख और उन्हें पानी देने का कार्य स्वयं कर रहे हैं। 6 साल की मेहनत के बाद 2018-19 में उन्हें पहली खुशी तब मिली जब उनके आम के पेड़ो नें फल देना शुरू कर दिया। उन्हें सुकुन और संतुष्टि मिली की आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और सपना साकार हुआ। दो सीजन तक उन्होंने अपने आम के बगीचे से प्राप्त आम को आस पास के गाँव वालो और रिश्तेदारों को दिये। जिसके बाद बचे आमों को बाजार में बेचकर कुछ आमदनी प्राप्त की जिसका प्रयोग उन्होंने बगीचे के रखरखाव, खाद-पानी और दवाइयों में किया। इस बार उनके बगीचे में आम की बंपर फसल तैयार हुई है। आस पास के लोग उनके आम के बागान को देखने आते हैं कई लोग उन्हें मैंगो मेन भी कहते हैं और फोटो भी खींचते हैं। सोबत सिंह बागडी को उम्मीद है कि इस बार उन्हें आम और नींबू से अच्छी खासी आमदनी हो जायेगी। 10 साल पहले देखा गया सपना अब धरातल पर साकार हो गया है।

सकारात्मक सोच और सही दिशा में प्रयास किये जाये तो पहाडों में रोजगार की असीमित संभावनाएं हैं– सोबत सिंह बागडी।

सोबत सिंह बागडी से उनके रिवर्स माइग्रेशन और स्वरोजगार को लेकर गुफ्तगु हुई। उनका कहना था की मेरा जीवन संघर्षमय रहा, मैंने हमेशा संघर्षों का समाना कर सफलता हासिल की। दिल्ली में बैंक की नौकरी, बच्चे अच्छी-खासी नौकरी में है। महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में मुझे हमेशा अपने गांव की याद आती थी। मैं गांव में ही बसना चाहता था। डाइबिटिज, ब्रेन स्ट्रोक और हर्ट अटैक जैसी बीमारियों का सामना करने के बाद भी भी मैंने वापस अपने गांव लौटने का फैसला किया। आज मेरे बगीचे में 1100 आम, 300 नींबू और 70 कटहल के पेड मौजूद है। जिनमें से आम और नींबू फल देने लगे हैं। शुरूआत में जरूर परेशानी हुई लेकिन आज 7 साल बाद जब लगाये पेड फल देने लगे हैं तो सुकुन मिलता है। आज मुझे लगता है कि मेरा गांव लौटने का फैसला सही था। अब मेरे बच्चे भी मेरी सफलता से गदगद हैं। उन्हें मुझ पर गर्व है। गांव आनें के बाद मैं कभी अस्पताल भी नहीं गया। मेरी दिनचर्या नें मेरी आधी बीमारी को समाप्त कर दिया है। काम करेंगे तो स्वस्थ रहेंगे। मेरा खासतौर से पहाड के युवाओं को सलाह है कि वे सकारात्मक सोचे और सही दिशा में प्रयास करें तो पहाडों में स्वरोजगार के जरिए रोजगार सृजन की असीमित संभावनाएं हैं। बस जरूरत है खुद पर विश्वास और भरोसा करने की। संयम, धैर्य रखेंगे और मेहनत करेंगे तो जरूर सफलता मिलेगी। पहाड़ की माटी थाती में जो बात है वो कहीं नहीं। देहरादून दिल्ली मुंबई में प्राइवेट क्षेत्रों में नौकरी करने से लाख गुना बेहतर है अपने घर गांव पहाड़ में स्वरोजगार कर रोजगार सृजन करना।

पलायन आयोग नें सराहा, युवाओं से कहा प्रेरणा लें..

पलायन आयोग की सदस्य रंजना रावत इन दिनों जनपद रूद्रप्रयाग के भ्रमण पर है। वो एक आगामी एक पखवाड़े तक जनपद के विभिन्न गांवों में भ्रमण करके स्वरोजगार के जरिए रोजगार सृजन करने वाले लोगों और ग्रामीणों से मिलेंगी। इस दौरान वो पलायन, रोजगार सहित अन्य विषयों पर परिचर्चा करेंगी और लोगों से सुझाव लेंगी। इसी क्रम में शनिवार को पलायन आयोग की सदस्य रंजना रावत सोबत सिंह बागडी के कार्यों को देखने उनके गांव जखोली ब्लाॅक के सेमलता गांव (भरदार) पहुँची और उनसे मिलकर बागवानी, स्वरोजगार, पलायन पर लंबी परिचर्चा की। इस दौरान उन्होंने उनसे सुझाव भी लाये। रंजना रावत नें सोबत सिंह बागडी के कार्यों की सराहना करते हुए कहा की पहाड़ के युवाओं से इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। बागडी जी का कार्य अनुकरणीय ही नहीं बल्कि प्रेरणादायक है। इस अवसर पर गढ माटी संगठन नें उन्हें सम्मानित भी किया और प्रशस्ति पत्र भी दिया व उन्हें गढ नायक के सम्मान से भी नवाजा।
वास्तव में देखा जाए तो लोग रोजगार की तलाश में पहाड़ों से पलायन कर रहें है जबकि पहाड़ में रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है। सोबत सिंह बागडी इसकी मिशाल है, उम्र के इस पड़ाव पर भी वे विगत 10 सालों से अकेले ही डटे है। मैंगो मैन के हौंसलें और जज्बे को सलाम, आज वो उन लोगों के लिए नजीर है जिन्हें पहाड़ केवल पहाड़ नजर आता है। अगर आप भी पहाड़ के आम बागन के आमों को खरीदना चाहते हैं तो चले आइये रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली ब्लाॅक के सेमलता गांव (भरदार)…

साभार : संजय चौहान

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