पांच वर्ष में उत्तराखंड में ढाई गुना बढ़े बेरोजगार!


एनएसएसओ की रिपोर्ट ने दिखाया आईना

  • देश के सबसे ज्यादा बेरोजगारी की समस्या से जूझने वाले राज्यों में उत्तराखंड भी शामिल
  • इस समय उत्तराखंड में रोजगार सेवायोजन कार्यालयों में नौ लाख 36 हजार पंजीकृत बेरोजगार 
  • बेरोजगारी की समस्या से निपटना इस समय प्रदेश सरकार के लिये सबसे बड़ी चुनौती
  • देशभर में तिगुना बढ़े बेरोजगार, गुजरात के हालात सबसे बदतर, जहां बेरोजगारी साढ़े नौ गुना बढ़ी  

देहरादून। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की वार्षिक श्रम बल रिपोर्ट से पता चलता है कि प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या कितना विकराल रूप लेती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड देश में बेरोजगारी के मामले में सातवें स्थान पर पहुंच गया है जो शुभ संकेत नहीं है। इस समय उत्तराखंड में नौ लाख 36 हजार पंजीकृत बेरोजगार हैं। जबकि अपंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या भी कहीं ज्यादा है। इस समस्या से निपटना इस समय प्रदेश सरकार के लिये सबसे बड़ी चुनौती हो गई है। प्रदेश में 2011-12 में बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत थी, 2017-18 में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.60 प्रतिशत हुई। उत्तराखंड भी देश के उन राज्यों में शुमार हो गया है, जहां बेरोजगारी सबसे ज्यादा है। गुजरात के हालात सबसे बदतर हैं। वर्ष 2011-12 में वहां बेरोजगारी दर 0.5 प्रतिशत थी जो 2017-18 में बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई।   
एनएसएसओ की वार्षिक श्रम बल रिपोर्ट के मुताबिक देश के 11 राज्यों में 2011-12 की तुलना में 2017-18 में बेरोजगारी दर दोगुना से लेकर साढ़े नौगुना तक बढ़ गई है। उत्तराखंड देश में बेरोजगारी के मामले सातवें स्थान पर है। उत्तराखंड में जहां 2011-12 में बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत थी, वह 2017-18 में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.60 प्रतिशत हो गई। हाल में प्रदेश सरकार की ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स रिपोर्ट के 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी के आंकड़े देखें तो वर्ष 2004-05 में युवाओं में बेरोजगारी दर छह फीसद तो पढ़े-लिखे युवाओं में 9.8 फीसद थी। वर्ष 2011-12 में यह बढ़कर युवाओं के लिए 10.2 व पढ़े लिखे युवाओं के लिए 17.2 प्रतिशत हो गई। जबकि 2017 के आंकड़ों के मुताबिक यह अब बढ़कर युवाओं के लिए 13.2 व पढ़े लिखे युवाओं के लिए 17.4 प्रतिशत हो गई है। 
मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के मैदानी और शहरी इलाकों में युवकों में बेरोजगारी की दर अधिक है। युवतियों की बेरोजगारी दर देखें तो उनकी बेरोजगारी दर पहाड़ी जिलों में युवकों की चार गुना व शहरी व मैदानी क्षेत्रो व ग्रामीण क्षेत्रों में युवकों की बेरोजगारी दर से दोगुने से अधिक है। साफ है कि प्रदेश में बेरोजगारी भीषण रूप ले चुकी है। प्रदेश सरकार के विभागों, निगमों, उपक्रमों आदि में 53,624 पद ही खाली हैं। 36,539 रिक्त पद केवल राजकीय विभागों के हैं। कुल खाली पदों में इसमें से 43,624 समूह ‘‘ग’ के पद हैं। लगभग 9 लाख 33 हजार सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकृत हैं। नौकरियों की स्थिति बहुत ही भयावह है। 
सेवायोजन विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो यह स्थिति निश्चित रूप से निराश करने वाली है। राज्य गठन के बाद अब तक 23 सेवायोजन कार्यालयों से 24,056 लोगों को ही इन कार्यालयों के माध्यम से नौकरियों मिली हैं। गैरपंजीकृत बेरोजगारों की भी फौज लगातार बढ़ती जा रही है। बहरहाल, एनएसएसओ की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 में जहां देश में बेरोजगारी दर 2.2 फीसद थी जबकि अब यह 6.1 प्रतिशत है। देश में हरियाणा, केरल, उत्तराखंड, बिहार, असम, झारखंड और उड़ीसा में बेरोजगारी दर बहुत बढ़ गई है जबकि 2011-12 में पंजाब, तमिलनाडु, उड़ीसा, उत्तराखंड और बिहार देश के सबसे अधिक बेरोजगारी वाले राज्यों की श्रेणी में शामिल हुए थे। देश में केरल उन राज्यों में है जहां सबसे ज्यादा यानी बेरोजगारी दर 11.4 फीसद है। जबकि 2011-12 में यह 6.1 प्रतिशत थी। इसके बाद हरियाणा में 8.6 प्रतिशत बेरोजगारी दर है जबकि 2011-12 में यह 2.8 फीसद ही थी। छत्तीसगढ़ में सबसे कम 3.3 प्रतिशत बेरोजगारी है। मध्य प्रदेश में 4.5, पश्चिमी बंगाल में 4.6 प्रतिशत बेरोजगारी दर है।

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