अभिनव प्रयोग

  • मुंबई के दो युवाओं के इस सराहनीय प्रोजेक्ट के तहत अब तक 13 राज्यों के तीन हजार गांवों में तीन लाख जोड़ी मुफ्त बांटीं
  • जल्द ही उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल के लिए रिसाइकिल शूज बनाकर बांटने की तैयारी
  • दो साल में 10 लाख जोड़ी चप्पल मुफ्त बांटने की तैयारी, बराक ओबामा और टाटा कर चुके हैं इस प्रोजेक्ट की तारीफ

मुंबई। महंगे स्पोर्ट्स शूज खराब होने पर लोग उन्हें फेंक देते हैं या किसी जरूरतमंद को दे देते हैं। पर मुंबई के दो युवाओं ने इनोवेटिव आइडिया से इन स्पोर्ट्स शूज से चप्पल बनाना शुरू किया। इन चप्पलों को वो गांव के स्कूली बच्चों को मुफ्त देते हैं, ताकि उन्हें स्कूल आने-जाने में आसानी हो।
मुबंई के श्रेयांश भंडारी और रमेश भंडारी पांच साल पहले शुरू हुए स्टार्टअप ग्रीन सोल के जरिए अब तक 13 राज्यों के तीन हजार गांवों में तीन लाख चप्पलें ऐसे जरूरतमंद बच्चों को दे चुके हैं। श्रेयांस के मुताबिक उन्हें अलग-अलग राज्यों से हर माह 1200 जोड़ी पुराने जूते मिलते हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी होती है। कंपनी अभी यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, मप्र, बिहार, राजस्थान , गुजरात , तेलंगाना, उड़ीसा, असम जैसे 13 राज्यों में बच्चों की मदद कर रही है। जल्द ही कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड के लिए रिसाइकिल शूज बनाकर बांटे जाएंगे।
25 साल के युवा श्रेयांस बताते हैं कि हर दिन करीब 500 चप्पलें मुफ्त देने वाले इस प्रोजेक्ट में टाटा, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी जैसी 55 कंपनियां आर्थिक मदद देती हैं। हमारी कोशिश की रतन टाटा और बराक ओबामा जैसी हस्तियां चिट्‌ठी लिखकर तारीफ कर चुकी हैं। फोर्ब्स की 30 साल से कम उम्र के आंत्रोप्रेन्योर के सूची में भी हमारा नाम आया। उन्होंने आने वाले दो साल में 10 लाख जोड़ी चप्पलें बांटने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए खराब जूते से चप्पल वाले 10 स्किल सेंटर अलग-अलग प्रदेशों के गांवों में खोले जाएंगे, जिसमें करीब एक हजार लोगों को राेजगार देंगे। श्रेयांस बताते हैं कि मैं स्कूल टाइम से प्रोफेशनल रनर रहा हूं। साल में तीन से चार स्पोर्टस शूज इस्तेमाल करता था। बाद में बेकार हो जाते थे। स्पोर्टस शूज हमने इसलिए चुने क्योंकि घरों से सबसे ज्यादा यही फेंके जाते हैं और उसकी सोल से रिसाइकल्ड चप्पल आसानी से बन जाती है। ये चप्पल दो से तीन साल तक आराम से चल जाती है। श्रेयांस बताते हैं कि शुरुआत में इस काम का अनुभव नहीं था, इसलिए आईआईटी स्तर पर कंपीटिशन में जीते हुए लाखों रुपए इसमें लगा दिए। जैसे-तैसे तकनीक पता चली तो श्रमिकों ने मना कर दिया। उनका तर्क था कि  किसी के पहने हुए जूते पर काम नहीं करेंगे। उन्हें हाइजीनिक तरीके से पुराने जूते से चप्पल बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। 

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