परिवारवाद के शिकंजे में जकड़ता उत्तराखंड!

देवभूमि की नियति

  • क्या केवल दरी बिछाने और नारे लगाने के लिये ढूंढे जाते हैं पार्टियों के कार्यकर्ता
  • हर बड़े नेता की विरासत संभालने को परिवार का कोई न कोई सदस्य तैयार 
  • पार्टियों के अन्य योग्य कार्यकर्ताओं के लिये बड़े पदों पर कोई जगह बाकी नहीं 

देहरादून। देश की आजादी के बाद से ही राजनीति में परिवारवाद का वर्चस्व रहा है। दिलचस्प बात यह है कि नेहरू और इंदिरा गांधी परिवार को कोसने वाले अन्य पार्टियों के बड़े नेता भी बाद में खुद परिवारवाद के शिकार हो गये। जिनमें लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का नाम भी शामिल है जिन्होंने कांग्रेस पर जमकर भाई—भतीजावाद और परिवारवाद के आरोप लगाये, लेकिन आज उनकी अपनी पार्टियों में उन्हीं के परिवार के लोग शीर्ष पर काबिज हैं और पार्टियों के अन्य योग्य कार्यकर्ताओं के लिये बड़े पदों पर कोई जगह बाकी नहीं है।
अपेक्षाकृत नया राज्य उत्तराखंड भी इस चलन से अछूता नहीं रहा है। धीरे—धीरे यहां भी कई राजनेताओं ने चुनाव और पार्टी के अहम पदों पर अपने परिजनों को ही वरीयता देना शुरू कर दिया है। सबसे ताजातरीन मामला भुवनचंद्र खंडूडी का है। जिन्होंने पिछले चुनाव में खुद मुख्यमंत्री रहते अपनी बेटी ऋतु खंडूड़ी को विधायक बनवाने के लिये यमकेश्वर में दो बार लगातार विधायक रही विजया बड़थ्वाल का टिकट काट दिया था। इसके बाद इस बार लोकसभा चुनाव में गढ़वाल लोकसभा सीट पर अपने बेटे मनीष को टिकट दिलवाने में नाकामयाब रहे तो मनीष कांग्रेस में शामिल हो गये और उसी सीट पर कांग्रेस के संभावित प्रत्याशी के रूप में भाजपा को टक्कर देने की तैयारी में जुट गये हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा देश के जाने माने नेता रहे हैं। वह देश के आबादी के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही केंद्रीय मंत्री भी रहे। उनके पुत्र विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और उनकी बेटी रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्ष रही और अब भाजपा सरकार में मंत्री हैं। उधर विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा दो बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। उनके दूसरे पुत्र सौरभ बहुगुणा फिलहाल भाजपा से विधायक हैं।  
कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत जो प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के साथ केंद्रीय मंत्री भी रहे और उनकी पत्नी रेणुका रावत लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। उनके पुत्र आनंद रावत युवा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं। कांग्रेस सरकार में विधानसभा अध्यक्ष रहे यशपाल आर्य फिलहाल भाजपा सरकार में मंत्री हैं और उनके पुत्र संजीव आर्य विधायक हैं। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मंत्री इंदिरा हृदयेश के पुत्र सुमित हृदयेश हल्द्वानी मेयर पद का चुनाव लड़ चुके हैं। कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की पत्नी हेमलता नेगी कोटद्वार की मेयर हैं।
पूर्व कांग्रेस नेता और कांग्रेस के पूर्व मंत्री रहे डॉ हरक सिंह रावत इस समय भाजपा में वनमंत्री हैं और उनकी पत्नी दीप्ति रावत इस समय पौड़ी की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। लैंसडोन से भाजपा विधायक दिलीप रावत की पत्नी नीतू रावत कोटद्वार से मेयर पद के लिये चुनाव लड़ चुकी हैं। भाजपा नेता और विधायक गणेश जोशी की बेटी नेहा जोशी और भाजपा के वरिष्ठ नेता हरबंस कपूर के बेटे अमित कपूर भी राजनीति में सक्रिय हैं। भाजपा के पूर्व मंत्री मातबर सिंह कंडारी के पुत्र राजीव कंडारी और पूर्व कांग्रेस विधायक रणजीत रावत के बेेटे बिक्रम रावत वर्तमान में युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। 
स्व. सुरेंद्र राकेश की पत्नी ममता राकेश कांग्रेस की विधायक हैं और उनका भाई सुबोध राकेश भाजपा में शामिल हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के छोटे भाई चमन सिंह देहरादून के जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। भाजपा के विधायक मुन्ना सिंह चौहान की पत्नी मधु चौहान पूर्व में देहरादून की जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। पूर्व कांग्रेस नेता कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन लक्सर से भाजपा विधायक हैं और उनकी पत्नी देवयानी कुंवर जिला पंचायत सदस्य हैं। पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री और वर्तमान में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत भी प्रदेश में मंत्री रह चुकी हैं। खुद को उत्तराखंड की जनभावनाओं का एकमात्र झंडाबरदार होने का दावा करने वाला उक्रांद भी इस बीमारी से नहीं बच पाया हैं। उक्रांद के विधायक रहे बिपिन चंद्र त्रिपाठी के पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी भी इस समय विधायक हैं।  
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में इतनी बड़ी तादाद में राजनेताओं के परिजनों का इस तरह राजनीति में उतरने से स्पष्ट है कि धीरे—धीरे प्रदेश में परिवारवार और भाई—भतीजावाद जड़ें जमाता जा रहा है जो एक सुखद संदेश नहीं है। ऐसे में उन लाखों कार्यकर्ताओं की उम्मीदों  पर तुषारापात होता है जो बरसों से बिना किसी मानदेय के इस आशा पर राजनीतिक पार्टियों के लिये दिन—रात बारह महीनों मजदूरों की तरह निस्वार्थ भाव से जुटे रहते हैं कि कल उनकी भी दावेदारी पर पार्टी हाईकमान गंभीरता से विचार करते हुए उन्हें भी अपने क्षेत्र से नेतृत्व करने का एक मौका देगा, लेकिन इन हालात में प्रदेश के लिये कुछ नया कर गुजरने की चाहत रखने वाले राजनीति से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिय पनघट की डगर बहुत कठिन हो गई है।     

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