अभिभावकों को दोनों हाथों से लूट रहे निजी स्कूल!

सिस्टम पर सवाल

  • एनसीईआरटी की किताबें लागू करने के प्रदेश सरकार के आदेश की खुलेआम उड़ाई जा रही धज्जियां
  • महंगी किताबों—कापियों के वसूल रहे पूरे पैसे, लेकिन बिल मांगने के नाम पर थमा रहे छोटी सी पर्ची 
  • आंखें मूंदे बैठे हैं शिक्षा विभाग के आला अफसर, किसी भी स्कूल में जाकर नहीं की वस्तुस्थिति जानने की कोशिश

देहरादून। प्रदेश में सभी निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें लागू करने सरकार के आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। शिकायत के बावजूद शिक्षा विभाग के आला अफसर आंखें मूंदे बैठे हैं और आज तक किसी भी स्कूल में जाकर वस्तुस्थिति जानने की जहमत नहीं उठाई है। नया शिक्षा सत्र शुरू होने के साथ ही अभिभावक जहां निजी स्कूलों की महंगी किताबों से परेशान हैं वहीं दुकानदार कापी-किताबों के पूरे पैसे वसूल रहे हैं, लेकिन बिल मांगने के नाम पर एक पर्ची अभिभावकों को थमाई जा रही है। ऑनलाइन पेमेंट लेने में भी आनाकानी की जा रही है। परेशान अभिभावकों का कहना है कि जब किताबों का पैसा पूरा दिया जा रहा है तो बिल पक्का मिलना चाहिए। 
निजी स्कूल टैक्स से बचने के लिए इस तरह का खेल कर रहे हैं। कापियों पर भी मनमाना शुल्क लिया जा रहा है साथ ही पक्का बिल बनाने पर दुकानदार अभिभावकों के साथ आनाकानी कर रहे हैं।
किताबों को लेकर दुकानदार भी मनमानी पर उतर आए हैं। डिजीटल इंडिया के इस दौर में दुकानदार ऑनलाइन पेमेंट से बच रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि आयकर से बचने के लिए दुकानदार ऑनलाइन पेमेंट नहीं ले रहे हैं। सिर्फ कैश होने पर ही किताबें दी जा रही हैं। डाकरा बाजार, डिस्पेंसरी रोड, पटेलनगर, बलबीर रोड, करनपुर में किताबों की अधिकतर दुकानों में कैश से अभिभावक किताब खरीद रहे हैं। राजीवनगर के अभिभावक धीरज अपनी बेटी की तीसरी कक्षा की किताब लेने के लिए डिस्पेंसरी रोड पहुंचे। किताब लेने के बाद उन्होंने दुकानदार से 4500 रुपये बिल का भुगतान ऑनलाइन करने की बात कही, लेकिन दुकानदार ने यह कहते हुए मना कर दिया कि इससे हमें परेशानी होती है।
राजपुर रोड स्थित स्कूल के अभिभावक डिस्पेंसरी रोड से पोते की छठी कक्षा की तीन किताब लेने पहुंचे। यहां भी बिल के नाम पर उन्हें डायरी से पर्ची फाड़कर 665 रुपये का भुगतान करने को कहा। पक्का बिल मांगने पर दुकानदार ने किताब वापस करने की बात कहकर अभिभावक को मजबूर कर दिया।
गढ़ी कैंट स्थित एक स्कूल के अभिभावक ने डाकरा बाजार से बच्चे की किताबें खरीदीं। लेकिन जब बिल मांगा गया तो 3610 रुपये लिखकर उन्हें एक छोटी सी पर्ची थमा दी। अभिभावक का कहना है कि दुकानदान ने पर्ची को ही बिल बताते हुए आगे बात करने से इनकार कर दिया। निजी स्कूल तय दुकान से ही किताबों के साथ मौजे, टाई और बेल्ट खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। परेशानी यह है कि महंगे दाम चुकाने के बाद भी गुणवत्ता ठीक नहीं है। लाडपुर के एक अभिभावक ने बताया कि उन्होंने कक्षा चार में बेटे का एडमिशन कराया। स्कूल ने किताब लेने को दुकान बताई। उसमें 60 के मौजे और 90 रुपए की टाई दी गई। जबकि बाहर इनके दाम आधे हैं।
नेशनल एसोसिएशन फोर पेरेंट्स एंड स्टूडेंट्स राइट्स के अध्यक्ष आरिफ खान ने कहा कि अभिभावक नए सत्र से ही परेशान हैं, यदि विभागीय अधिकारी उनकी शिकायत नहीं सुनेंगे तो उनकी सारी उम्मीद टूट जाएगी। अधिकारियों को चाहिए कि शिकायत मिलने पर विभाग नियम विरुद्ध दुकानदारों और स्कूलों पर सख्त कार्रवाई करें। वहीं ऑल उत्तराखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज सिंघल का कहना है कि स्कूल ऑनलाइन फीस भी नहीं लेते। स्कूल और दुकानदारों की मिलीभगत के चलते अभिभावक परेशान हैं। 
इस बारे में देहरादून की मुख्य शिक्षा अधिकारी आशा रानी पैन्यूली ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि अभिभावकों की ओर से अभी विभाग के पास शिकायत नहीं आई है। शिकायत मिलने पर खंड शिक्षा अधिकारी संबंधित स्कूल में जांच करेंगे। जांच सही पाए जाने पर आगे कार्रवाई की जाएगी। 

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