ब्रिटिश सरकार के माथे पर कलंक है जलियांवाला बाग का नरसंहार

तोड़ीं क्रूरता की हदें

  • सौ साल पहले आज ही के दिन 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग में करीब 15 से 20 हजार निहत्थे लोगों की भीड़ पर ब्रिगेडियर डायर ने बरसाई थीं गोलियां 
  • उस समय ब्रिटिश सेना ने जलियांवाला बाग की खूनी घटना में शहीद हुए लोगों के परिजनों और घायलों के लिए दी थी 19.42 लाख रुपये की अनुग्रह राशि 

सौ साल पहले 13 अप्रैल, 1919 ही वह दिन था, जब पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में करीब 15 से 20 हजार लोग बैसाखी के पावन पर्व पर दो बड़े क्रांतिकारियों सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की रिहाई के लिए जलियांवाला बाग में जुटे थे। मगर ब्रिगेडियर डायर ने निहत्थे बेकसूर लोगों पर अंग्रेजी सेना ने अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। जिसमें एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।
सौ वर्ष पहले आज ही के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग को ब्रिटिश सेना ने निहत्थे और निर्दोष लोगों के खून से भर दिया था। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल इस कृत्य को राक्षसी करार दे चुके हैं लेकिन ब्रिटिश सरकार अभी भी इस हत्याकांड के लिये माफी मांगने को तैयार नहीं है। भारतीयों के साथ ही ब्रिटेन के सांसद और पाकिस्तान भी ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने की मांग कर रहा है। तो आखिर ब्रिटेन को माफी मांगने से दिक्कत क्यों है?
अगर ब्रिटेन जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए माफी मांगता है तो अकेले भारत के लिए ही उसे एक डॉजियर तैयार करना पड़ सकता है जिसमें बंगाल का अकाल भी शामिल होगा जिसमें दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को खाना खिलाने के लिए भारत के अन्न भंडार को नष्ट कर 40 लाख लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया था। उस समय ब्रिटिश सेना ने जलियांवाला बाग की खूनी घटना में मृतकों के लिए परिजनों और घायलों के लिए 19.42 लाख रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की थी जिसे अगर आज के समय के हिसाब से देखा जाए तो इसका मूल्य करीब 108 करोड़ रुपये होगा। अतीत में इस घटना को उन्होंने शर्मनाक और व्यथित करने वाला करार दिया है। 

इतिहासकार और ‘न्यू लाइट ऑन जलियांवाला बाग’ के लेखक केके खुल्लर की मानें तो इस नरसंहार का असली दोषी डायर नहीं बल्कि ओ ड्वायर था। पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ ड्वायर ने ही गोली चलाने के आदेश को मंजूरी दी थी। खुल्लर के अनुसार डायर और ड्वायर के बीच सीधी बातचीत हो रही थी। ड्वायर ने डायर को लिखे तार में कहा, ‘आप सही करने जा रहे हैं। लेफ्टिनेंट गवर्नर आपको इसकी सहमति देते हैं।’ 
हालांकि पंजाब के महान शहीद उधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को इस कांड का बदला लेते हुए लंदन के कैक्सटन हॉल में ओ ड्वायर को मार डाला।
इस भयावह घटना को सौ साल बीत चुके हैं, लेकिन आज तक यह पता नहीं चल सका है कि वास्तव में कितने लोगों ने अपनी शहादत दी थी। इतिहासकार मृदुला मुखर्जी के अनुसार जलियांवाला बाग में मरने वालों की संख्या को लेकर दो तरह की आंकड़े हैं। ब्रिटिश सरकार के मुताबिक 379 लोगों ने जान गंवाई थी। जबकि भारतीयों द्वारा कराई गई जांच में यह आंकड़ा एक हजार से ऊपर है। वह बताती हैं कि इतने बड़े नरसंहार की सही तस्वीर पेश करने के लिए गांधी, मदन मोहन मालवीय व अन्य  नेताओं ने काफी प्रयास किए थे। 
ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित हंटर आयोग ने पहले 200 लोगों के मारे जाने की ही बात मानी। पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव जेपी थॉमसन ने भी अपनी डायरी में 200-300 लोगों के मरने की बात लिखी। ब्रिटिश मीडिया ने भी इस पर विश्वास कर लिया। अमृतसर के खालसा कॉलेज के गेरार्ड वाथेन ने 1042, पंडित मदन मोहन मालवीय ने करीब 1000 और गांधी जी ने 1500 के आसपास लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया था। 
इसी तरह एक निजी संस्थान सेवा समिति ने घर-घर जाकर सर्वे किया और 530 लोगों के मारे जाने की बात कही। मगर बाद में इसे 379 कर दिया गया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने भी मान लिया। मगर आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उस दिन शहादत देने वालों की वास्तविक संख्या कितनी थी। 

ब्रिगेडियर डायर से हंटर कमीशन के पूछे गए सवाल…
सवाल: मुझे लगता है कि क्या सही है, यह फैसला जब आप करने जा रहे थे तो आपके पास इस बारे में अपना मन बनाने का समय था। आप इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अगर वहां सच में कोई रैली है तो सही यही होगा कि सीधे उन पर गोलियां चला दी जाए?
जवाब: मैं अपना मन बना चुका था।
सवाल: इस प्रश्न पर विचार किए बगैर कि आपकी सेना पर भी हमला हो सकता है?
जवाब: नहीं, स्थिति बेहद गंभीर थी। मैं अपना मन बना चुका था कि अगर मीटिंग उसके बाद भी जारी रहती तो मैं सभी लोगों को मार देता।

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