दुनियाभर के मीडिया में सुर्खियां बनीं कृषि कानूनों की वापसी

अपने-अपने आसमां

  • न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा- आखिर नरम पड़े पीएम मोदी
  • पाकिस्तानी अखबारों ने कहा- झुक गई मोदी सरकार

वॉशिंगटन/लंदन। आज शुक्रवार को एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया है। भारत में तो इसकी चर्चा होना लाजमी था, लेकिन दुनियाभर के मीडिया भी लगातार इस पर नजर रखे हुए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और पाकिस्तान की वेबसाइट्स और अखबारों ने इसे होम पेज पर जगह दी है। उन सबकी हर खबर का सार यही है कि मोदी सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा, सरकार हारी और किसान जीते।
नरम पड़ गए मोदी : भारत में जैसे से ही मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया। इसके चंद मिनट बाद ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के वेबसाइट पर यह खबर फ्लैश हो गई। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा- करीब एक साल तक चले किसान आंदोलन के सामने प्रधानमंत्री मोदी को आखिर रुख बदलना पड़ा। सरकार ने सॉफ्ट अप्रोच अपनाने का फैसला किया और विवादित कृषि कानून वापस ले लिए गए। अच्छी बात यह है कि आंदोलन कर रहे किसानों ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। आंदोलन कर रहे किसानों में सिखों की तादाद काफी ज्यादा थी। शायद यही वजह है कि मोदी ने प्रकाश पर्व पर इस फैसले का ऐलान किया। खबर के साथ यह फोटो न्यूयॉर्क टाइम्स ने पब्लिश किया है।

सीएनएन ने कहा- सियासी मजबूरी : सीएनएन ने मोदी के भाषण को हूबहू पब्लिश किया। इसमें बताया कि सरकार ने इस फैसले का ऐलान एक अहम दिन किया। किसान नेता दीपक लांबा के हवाले से लिखा- यह किसानों की बहुत बड़ी जीत है। हम ये मानते हैं कि मोदी सरकार ने यह फैसला सियासी मजबूरियों के चलते लिया है। वेबसाइट ने लिखा- भारत कृषि प्रधान देश है और कोई भी सरकार किसानों को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकती। अगले साल तक सात राज्यों में चुनाव होने हैं। मोदी को अगर सत्ता में रहना है तो इन चुनावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये भी सच है कि इन सात में से छह राज्यों में अभी भाजपा सत्ता में है। सीएनएन ने अपनी खबर के साथ यह फोटो लगाया। लिखा- भारत में कोई भी सरकार किसानों को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकती।
किसानों की बात नहीं सुनी : ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने लिखा- 2020 में जब यह कृषि कानून लाए गए थे तो लगा था कि सरकार कृषि का पूरा ढांचा बदलना चाहती है। देश की 60% आबादी एग्रीकल्चर सेक्टर पर डिपेंड है। लिहाजा, इस कदम पर हर किसी की नजरें थीं। हुआ भी वही, सरकार का यह कदम किसानों को नागवार गुजरा। उनका तर्क बिल्कुल वाजिब था। वो ये कह रहे थे कि जिन किसानों के लिए सरकार ने कानून बनाए, उनसे ही बातचीत क्यों नहीं की गई। इससे तो उनकी रोजी-रोटी और जिंदगी ही खतरे में पड़ गई। ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ ने कृषि कानून वापस लिए जाने के फैसले को इस तरह पेश किया।

मोदी ने फिर चौंकाया : कनाडा के अखबार द ग्लोबल एंड मेल ने लिखा- प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर चौंका दिया। उनकी एक बात पर गौर करना चाहिए। मोदी ने कहा- अब हमें नई शुरुआत करनी चाहिए। प्रकाश पर्व पर मोदी के इस ऐलान के कई मायने निकाले जा सकते हैं। इसके राजनीतिक कारण भी अहम हैं। पिछले साल सितंबर में इन कानूनों को पास किया गया था। तब से इनका विरोध हो रहा था और सरकार की परेशानियां बढ़ती जा रहीं थीं। द स्टार डॉट कॉम ने भी करीब-करीब यही नजरिया रखा।

सरकार पीछे हट गई : पाकिस्तान के सबसे बड़े अखबार डॉन और वेबसाइट डॉन डॉट कॉम ने एजेंसी इनपुट के साथ अपनी वेबसाइट पर यह खबर चलाई। हैडिंग में ही लिखा- कृषि कानूनों पर मोदी को कदम पीछे खींचने पड़े। जियो टीवी टीवी और ट्रिब्यून डॉट कॉम पीके जैसी अहम वेबसाइट की खबरों का सार भी करीब-करीब यही रहा। द डॉन ने दो सिख किसानों की एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हुए फोटो लगाई। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के शुक्रवार को दिए राष्ट्र के नाम संबोधन का वीडियो भी लगाया। इसी में उन्होंने कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया था।

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