नहीं रहे स्वाधीनता सेनानी और सांसद पैन्यूली

प्रख्यात लेखक और पत्रकार परिपूर्णानंद पैन्यूली के निधन से शोक की लहर

देहरादून। यहां बसंत विहार क्षेत्र में रह रहे स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और पत्रकार परिपूर्णानंद पैन्यूली हमारे बीच नहीं रहे। वह अस्वस्थता के चलते ओएनजीसी अस्पताल में भर्ती थे जहां उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। वह 94 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर मिलते ही उनके परिचितों में शोक की लहर दौड़ गई।  
परिपूर्णानंद पैन्यूली का जन्म 19 नवम्बर 1924 में टिहरी के पास छोलगांव में हुआ था। उनके दादा राघवानन्द पैन्यूली टिहरी रियासत के दीवान थे और पिता कृष्णा नन्द रियासत के इंजीनियर थे। इनकी माता का नाम एकादशी था। उनकी पत्नी कुन्तीरानी पैन्यूली वैल्हम गर्ल्स स्कूल में शिक्षिका थीं। 
वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मेरठ बम कांड में पकड़े जाने पर परिपूर्णानंद को पांच साल की कैद हुई। मेरठ जेल में वह चौधरी चरण सिंह के भाई श्याम सिंह, बनारसी दास और भैरव दत्त धूलिया आदि के साथ रहे। उसी दौरान उन्होंने जेल से फरार होने का प्रयास भी किया मगर सफल नहीं हुये। मेरठ जेल से ही उन्होंने बारहवीं की परीक्षा की तैयारी की और परीक्षा देने के लिये उन्हें लखनऊ ले जाया गया। उन्होंने इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की।
रफी अहमद किदवई की मदद से वह मेरठ जेल से 1946 में समय से पहले रिहा होकर  गृहनगर टिहरी आ गये और उसी दौरान वहां चल रहे किसान आन्दोलन में शामिल हो गये। आंदोलन के दौरान 24 जुलाई 1946 को पकड़े जाने पर उन्हें टिहरी जेल भेजा गया। जेल की अमानवीय स्थिति के खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल भी की। उन्हें 27 नवम्बर 1946 को राजद्रोह के आरोप में 18 माह की कठोर कैद की सजा सुनाई गई।
हालांकि सजा मिलने के 13वें दिन ही पैन्यूली 10 दिसम्बर 1946 को दिनदहाड़े टिहरी जेल से फरार हो गये। कड़ाके की ठंड में उन्होंने भिलंगना और भगीरथी नदियां पार कीं तथा नंग धड़ंग साधु के वेश में जंगलों से भटकते भटकते हुए चकराता पहुंचे और वहां से वह साधु के वेश में ही देहरादून आये। इसके बाद वह दिल्ली चले गये जहां उनकी मुलाकात जयप्रकाश नारायण और जवाहर लाल नेहरू से हुयी। जयप्रकाश नारायण ने उन्हें शंकर के छद्म नाम बंबई भेज दिया। वहां उनकी भेंट संयुक्त प्रांत के प्रीमियर पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त से हुयी तो उन्होंने पैन्यूली को ऋषिकेश में रहकर गतिविधियां चलाने की सलाह दी ताकि टिहरी पुलिस उन्हें ब्रिटिश इलाके से पकड़ न सके।
ऋषिकेश पहुंच कर पैन्यूली ने टिहरी राजशाही के खिलाफ चल रहे आन्दोलन के प्रमुख नेता भगवानदास मुल्तानी के घर को अपना ठिकाना बनाया। उस आन्दोलन में मुल्तानी का घर श्रीदेव सुमन और नागेन्द्र सकलानी जैसे बड़े आन्दोलनकारी नेताओं का अड्डा हुआ करता था।  पैन्यूली के अनुज सच्चिदानंद पैन्यूली भी स्वाधीनता सेनानी हैं।  
टिहरी में 26—27 मई 1947 को हुए अधिवेशन में पैन्यूली को उनकी अनुपस्थिति में ही प्रजामण्डल का प्रधान और दादा दौलतराम को उप प्रधान चुन लिया गया। 15 अगस्त 1947 को जैसे ही देश आजाद हुआ तो वह टिहरी चल पड़े लेकिन उसी दिन उन्हें नरेन्द्रनगर में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जहां उनके साथ अमानवीय बर्ताव किया गया। जिसके खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल भी की। 
पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद राजशाही के खिलाफ आन्दोलन और अधिक भड़क उठा। अखिल भारतीय लोक परिषद के नेताओं तथा कर्मभूमि के सम्पादक भक्त दर्शन आदि के हस्तक्षेप और भारी जनाक्रोश के चलते उन्हें सितम्बर 1947 में रिहा कर दिया गया।  टिहरी विधानसभा के चुनाव और अन्तरिम सरकार के गठन में उनकी अहम भूमिका रही। इसके बाद पंजाबहिल्स की टिहरी समेत हिमाचल की 35 रियासतों के प्रजामंडलों के दिशा निर्देशन के लिये ‘हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल काउंसिल’ गठित की गई। यह एक तरह से हिमालयी राज्यों की प्रदेश कांग्रेस ही थी और 10 जून 1947 को हुये इस काउंसिल के चुनाव में परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने डा. यशवन्त सिंह परमार को भारी मतों से पराजित किया था। डा.परमार आधुनिक हिमाचल प्रदेश के निर्माता माने जाते हैं।
पैन्यूली न केवल महान स्वतंत्रता सेनानी रहे बल्कि कई दशकों तक मूर्धन्य पत्रकारों में से एक रहे। वर्ष 1949 में पैन्यूली पत्रकारिता से जुड़ गये। वह सबसे पहले टाइम्स आफ इण्डिया की ओर से इलाहाबाद में स्टाफ रिपोर्टर नियुक्त हुए मगर उन्होंने देहरादून में उसी अखबार का स्टिंगर बनना पसन्द किया। वह हिन्दुस्तान टाइम्स, नेशनल हेराल्ड, पायनियर, इकोनोमिक टाइम्स आदि अखबारों से लगभग 60 वर्षों तक जुड़े रहे। उन्होंने देहरादून से कई वर्षों तक हिमानी साप्ताहिक अखबार चलाया। बाद में हिमानी सान्ध्य दैनिक भी निकाला। 
परिपूर्णा नन्द पैन्यूली ने दो दर्जन से अधिक हिन्दी और अंग्रेजी की पुस्तकें भी लिखीं। उनमें से ”देशी राज्यजन आन्दोलन“ की भूमिका कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष बी. पट्टाभिरमैया ने लिखी थी। इसी प्रकार ”नेपाल कापुनर्जारण“ की भूमिका डा. सम्पूर्णानन्द और ”भारत का संविधान और संसद तथा संसदीय प्रक्रिया“ की भूमिका आचार्य नरेन्द्र देव ने लिखी थी।
पैन्यूली ने सन् 1971 में हुये लोकसभा चुनाव में महाराजा मानवेन्द्र शाह को इतनी बुरी तरह पराजित किया कि महाराजा अगले 20 सालों तक चुनाव से ही तौबा करते रहे। पैन्यूली पहली बार छह साल तक चली लोकसभा (1971 से 1977) के सदस्य रहे।

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