नई दिल्ली। कोरोना की दूसरी लहर में ऐसी सैकड़ों खबरें देखने को मिलीं जिनमें ऑक्सीजन की कमी से मरीजों की मौत हुई थी, लेकिन कल यानी मंगलवार को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में मोदी सरकार ने दावा किया कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत रिपोर्ट नहीं हुई है।
राज्यसभा में कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने सरकार से सवाल पूछा कि क्या ये सच है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में मरीजों की मौत हुई। इस पर सरकार की ओर से स्वास्थ्य राज्यमंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार ने लिखित जवाब में कहा कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। उनकी ओर से कोरोना से हुई मौत की सूचना दी जाती है, लेकिन इसमें ऑक्सीजन की कमी से किसी मौत की सूचना नहीं है।
इस दावे पर पूरी दुनिया में सवाल उठ रहे हैं और सब पूछ रहे हैं तो सच क्या है? क्या देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। अब मोदी सरकार की आंखें खोलने वाले ये तीन ऑफिशियल मामले पढ़ लीजिए…
पहला मामला, 1 मई, दिल्ली हाईकोर्ट : दिल्ली के बत्रा हॉस्पिटल ने हाईकोर्ट को बताया कि उनके यहां ऑक्सीजन की कमी से 12 मरीजों की मौत हो गई है। हॉस्पिटल के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुधांशु बनकटा ने कोर्ट में कहा कि उनके यहां ऑक्सीजन खत्म हो गई थी। समय पर नई सप्लाई न मिलने से मरीजों की जान चली गई।
दूसरा मामला, 1 मई, दिल्ली हाईकोर्ट : दिल्ली के जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल ने हाईकोर्ट में बताया कि 24 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी से उनके अस्पताल में 25 लोगों की मौत हो गई।
तीसरा मामला, 21 जुलाई, कर्नाटक हाईकोर्ट का पैनल : कर्नाटक हाईकोर्ट की बनाई एक कमेटी ने पाया कि दूसरी लहर के दौरान चामराजनगर के जिला अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 36 लोगों की मौत हो गई। हालांकि उपमुख्यमंत्री सीएन अश्वथ नारायण ने इस रिपोर्ट के आंकड़े से इनकार किया और कहा कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई।
स्टडी में दावा- 6 अप्रैल से 19 मई के बीच ऑक्सीजन की कमी से 629 मौतें : शोधकर्ताओं, वकील और स्टूडेंट्स के एक इंडिपेंडेंट ग्रुप ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का रिकॉर्ड रखने की कोशिश की है। उन्होंने न्यूज रिपोर्ट, जांच पैनल और अस्पतालों के बयान के आधार पर एक डेटा बेस तैयार किया है।
डेटाबेस के मुताबिक इस साल 6 अप्रैल से 19 मई के बीच यानी 43 दिनों में देश के 110 अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से 629 मरीजों की मौत हुई है। इस आंकड़े में वो मरीज शामिल नहीं हैं, जो घर पर क्वारैंटाइन थे, अस्पताल ने भर्ती करने से मना कर दिया था या ऑक्सीजन की कमी की वजह से डिस्चार्ज कर दिए गए थे। 23 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी से सबसे ज्यादा 60 मौतें हुईं। इसमें दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों सर गंगाराम और जयपुर गोल्डेन में 46 मौतें रिपोर्ट हुई थीं। अस्पतालों के बयान के बयान के बावजूद अधिकारियों ने ऑक्सीजन की कमी से मौत होने की बात से इनकार कर दिया।
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हाईकोर्ट को कहना पड़ा- पानी सर के ऊपर जा चुका है : 2 मई को दिल्ली के सीताराम भारतीय अस्पताल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अस्पताल ने बताया कि उनके यहां 42 कोरोना मरीज हैं और सिर्फ 30 मिनट की ऑक्सीजन बची है। नई सप्लाई कहीं से मिलती नहीं दिख रही है। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से फौरन ऑक्सीजन का इंतजाम करने के आदेश दिए। दिल्ली हाईकोर्ट में विपिन सांघी और रेखा पल्ली की बेंच ऐसे मामलों की सुनवाई करती थी। लगातार ऑक्सीजन की कमी के बीच जस्टिस सांघी ने अधिकारियों से कहा था कि पानी सिर के ऊपर जा चुका है। अप्रैल में भी एक सुनवाई के दौरान जस्टिस सांघी ने अधिकारियों से कहा था कि चाहे मागों, उधार लो, चोरी करो या इम्पोर्ट करो। शहर के ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करो।
मोदी ने की दो बड़ी बैठकें और सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट : मोदी ने 16 अप्रैल और 22 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी को लेकर दो बैठक की। इसमें सभी विभागों के अधिकारियों को सप्लाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट में बताया कि ऑक्सीजन की डिमांड को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। इसमें ऑक्सीजन टैंकर्स की संख्या बढ़ाना, इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध, मेडिकल ऑक्सीजन का इम्पोर्ट करना, सिलेंडर की उपलब्धता बढ़ाना, एयर और रेल ट्रैवल जैसी बातें शामिल थीं।

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