उत्तराखंड : बाकी बचे डेढ़ साल तो भाजपा नेताओं को क्यों याद आ रही ‘उपेक्षा’!

देहरादून। जहां त्रिवेंद्र सरकार के इस कार्यकाल के मात्र डेढ़ साल ही बाकी बचे हैं और आम आदमी पार्टी (आप) ने उत्तराखंड में चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान क्या किया, तमाम अतिमहत्वाकांक्षी नेताओं की भुजायें फड़कने लगी हैं और अब वे खासे चौड़े होते नजर आ रहे हैं। भाजपा के विधायक अपनी नाराजगी जताने दिल्ली तक जा रहे हैं। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि भाजपा विधायकों को अपनी उपेक्षा त्रिवेंद्र सरकार के साढ़े तीन के कार्यकाल के बाद अचानक क्यों याद आ रही है। क्या ये ‘आप’ की दस्तक के बाद प्रेसर बनाने की कोशिशें तो नहीं हैं।
‘आप’ की उत्तराखंड में दस्तक के बाद भले ही भाजपा इसे महज एक शगूफा बता रही है, लेकिन यह भी सच है कि आप’ के आने से भाजपा में अपने नेतृत्व के खिलाफ स्वर मुखर हो रहे हैं। इसी बीच भाजपा ने कैबिनेट में खाली पडे तीन पदों को भरने की बात की तो प्रेशर बनाने के लिये भाजपा विधायकों का विरोध मुखर होना शुरू हो गया। हालांकि विधायक और मंत्री अफसरशाही को लेकर तमाम बातें करते रहें हैं और सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत भी अपने अंदाज में उनकी शिकायतों का समाधान करते रहे हैं।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि कैबिनेट के तीन मंत्री पदों को लेकर जिन नामों की चर्चा तेज हुई तो मायूस भाजपा विधायकों का दिल का दर्द जुबां पर आ गया। सूत्रों के अनुसार पूरन सिंह फर्तयाल के कंधे पर बंदूक चला रहे एक पूर्व अध्यक्ष और पूर्व मंत्री ने एक बड़े अखबार के संवाददाता को फोन किया कि उनके साथ 28 एमएलए है, लेकिन वो जब पहुंचा तो मैदान खाली था। उधर अब देहरादून के रायपुर क्षेत्र के विधायक उमेश शर्मा काउ ने सीएम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखा है जिसमें अपने विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों की उपेक्षा को आधार बनाया है।
इस तरह से ही कई दिनों से सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गरम है। कहीं दावा किया जा रहा है कि 18 विधायकों की बैठक फलां जगह हुई। फिर यह संख्या 27 तक पहुंच गई। वरिष्ठ विधायक बिशन सिंह चुफाल की तो भाजपा अध्यक्ष नड्डा से मुलाकात और एक भाजपा सांसद के भी इस मुहिम में शामिल होने की चर्चा खासी तेज हो रही है। ऐसे में भाजपा विधायकों का बदला रुख इस बात का इशारा कर रहा है कि ये हाईकमान पर प्रेसर बनाकर मनमानी करना चाहते हैं।
हालांकि इन विधायकों की नौकरशाही से नाराजगी को मुख्यमंत्री से नाराजगी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि नाराज़ विधायकों का नेतृत्व डीडीहाट के विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया में चुफाल की राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात की भी फ़ोटो वायरल हो रही है। दूसरी ओर भाजपा सूत्रों का कहना है कि आलाकमान चुफाल द्वारा विधायकों को जमा कर अपनी ही सरकार ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने से नाराज़ है। इसके लिये चुफाल को आलाकमान से फटकार भी पड़ी है। आलाकमान ने उन्हें साफतौर पर बता दिया है कि वह अपने क्षेत्र में काम पर ध्यान दे और त्रिवेंद्र सरकार के खिलाफ असन्तोष फैलाने से बाज आये।
इस मामले में एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि चुफाल 70 पार हो गए हैं। विधानसभा में सक्रियता भी कम है। इसलिए उन्हें लग रहा है कि अगली बार कहीं टिकट न कट जाए। इसलिए मन्त्री बनने की चाहत में वह ऐसा कर रहे हैं। साथ ही उनके चेलों को खड़िया और मेग्निशियम के खनन का काम नहीं मिल पा रहा है। उनका दबाव भी चुफाल के ऊपर है। दूसरी ओर पूरन सिंह और उमेश शर्मा काउ के भी अपने अपने निहितार्थ हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इन सभी की निगाहें त्रिवेंद्र सरकार में खाली पड़े मंत्री पदों पर हैं और इस बारे में वे अपने ‘मन की बात’ को साफ बताने में झिझक रहे हैं।
हालांकि आलाकमान से नसीहत मिलने के बाद बिशन सिंह चुफाल आज गुरुवार को बैक फुट पर नजर आये। उन्होंने साफ किया कि वह मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत से कतई खफा नहीं हैं। बगावत के शोर में कोई दम नहीं है। इसके बारे में तो वह सोच भी नहीं सकते हैं। वह दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से क्षेत्रीय समस्याओं के बारे में मिले थे, न कि नाराजगी-असंतोष जताने या किसी की शिकायत करने। उन्होंने इन चर्चाओं को भी निराधार करार दिया कि उनके साथ कई विधायक हाई कमान से मिलने गए थे।
भाजपा सूत्रों के अनुसार त्रिवेंद्र सरकार के खिलाफ पार्टी विधायकों के ‘बगावती सुर’ सोशल मीडिया की देन है। कुछ छुटभैये पत्रकारों ने बढ़ा चढ़ाकर उनके बयानों को कुछ इस तरह पेश किया जिससे अफवाहों को बल मिला। जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। त्रिवेंद्र सरकार को सभी विधायकों का पूरा समर्थन मिल रहा है और सब सरकार के विकास कार्यों को जन जन तक पहुंचाने में जुटे हुए हैं।

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