नोटबंदी होते ही 50 लाख ने गंवाईं नौकरियां!

कड़वा सच

  • अजीम प्रेमजी विवि की ओर से जारी रिपोर्ट का आंख खोलने वाला खुलासा 
  • रिपोर्ट का दावा, अभी तक भी नहीं सुधरे नोटबंदी के बाद बने हालात  
  • बेरोजगारी के सबसे ज्यादा शिकार हुए 20-24 आयु वर्ग के युवा 

वर्ष 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी का ऐलान किया था और 1000-500 के नोट बंद कर दिए थे, उसके बाद से लेकर 2018 के बीच करीब 50 लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था। इसका खुलासा अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय (बेंगलुरू) की ओर से जारी की गई रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट बताती है कि सितंबर 2016 से दिसंबर 2016 के बीच लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया था। इसका मतलब साफ है कि सितंबर 2016 में नौकरियों में कमी आने लगी। वहीं वर्ष 2017 की दूसरी तिमाही में इसकी दर में थोड़ी कम आई, लेकिन बाद में नौकरियों के मौके लगातार कम होते गये और वर्ष 2018 तक उनमें कोई सुधार नहीं हुआ।  
बता दें कि नौकरियों में गिरावट की शुरुआत का समय नोटबंदी के वक्त ही शुरू होता है।
रिपोर्ट के अनुसार अगर तीन सालों की बात करें तो जनवरी-अप्रैल 2016 से सितंबर-दिसंबर 2018 तक रोजगार के अवसरों में 7.8 फीसद तक की कमी आई। साथ ही नोटबंदी से भविष्य में भी नौकरी का संकट होने की बात कही गई है और अभी रिपोर्ट का दावा है कि अब तक नोटबंदी के बाद बने हालात सुधरे नहीं है।
वहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि बेरोजगारी के सबसे ज्यादा शिकार 20-24 आयु वर्ग के युवा हुए हैं और नोटबंदी से पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुई हैं।
वर्ष 2016—18 के बीच देश में काम करने वाले पुरुषों की आबादी में 161 लाख की वृद्धि हुई। वहीं इसके उलट इस अवधि के दौरान 50 लाख लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा।
गौरतलब है कि अभी तक इस रिपोर्ट में पुरुषों के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है। अगर इसमें महिला कर्मचारियों के आंकड़े शामिल किए जाते हैं तो इस संख्या में और भी इजाफा हो सकता है। लोकसभा चुनाव के दौरान यह रिपोर्ट सामने आने से विरोधी पार्टियों को सरकार पर हमला बोलने का एक और मौका मिल सकता है। वे लंबे वक्त से रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेरने के प्रयासों में जुटी हैं।

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